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ROE के फायदे

ROE के फायदे

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क्या आपका लाडला भी ज्यादा रोता है! कॉलिक तो नहीं है इसका कारण?

क्या आपका लाडला भी ज्यादा रोता है! कॉलिक तो नहीं है इसका कारण?

रोना नवजात शिशुओं के लिए बात करने का एक तरीका है, लेकिन बच्चे का ज्यादा रोना किसी परेशानी का संकेत भी हो सकता है। आमतौर पर शिशु दिन में लगभग एक से तीन घंटे रोते हैं, लेकिन शिशु रोजाना या हफ्ते में तीन दिन, तीन घंटे या फिर इससे ज्यादा समय तक रोए तो हो सकता है कि शिशु को कॉलिक (Colic) की समस्या हो सकती है।

एक पब्लिकेशन से बात करते हुए दृष्टि बिजलानी ने बताया कि “कॉलिक की समस्या हर तीन में से एक शिशु को हो सकती है। यह सामान्य तौर पर जन्म के दो से चार सप्ताह बाद तक शिशुओं में देखी जा सकती है जो धीरे-धीरे खुद ही खत्म हो जाती है।” “हैलो स्वास्थ्य” के इस आर्टिकल में जानते हैं कि बच्चे का ज्यादा रोना (Excessive Crying) कब समस्या बन जाता है? इसके लिए क्या करना चाहिए?

कैसे पहचानें कि बच्चे का ज्यादा रोना ‘कॉलिक’ (Colic) है?

बच्चे का ज्यादा रोना कॉलिक (Colic) है या नहीं यह मां के लिए यह पहचानना मुश्किल हो जाता है। नवजात शिशुओं में यह समस्या (लड़कों और लड़कियों में) एक ही उम्र पर होती है। इसके लिए इन लक्षणों पर ध्यान दें जिससे पता लग सके कि बच्चे का ज्यादा रोना नॉर्मल रोना (Cry) नहीं है, बल्कि कॉलिक है।

  • दिन में तीन घंटे से ज्यादा रोना (अक्सर शाम के समय)
  • मां के द्वारा शिशु को चुप कराने पर भी शांत न होना
  • रोने के दौरान बीच-बीच में सामान्य व्यवहार करना (खुश रहना)
  • शिशु बीमार न हो, फिर भी उसका ज्यादा रोना
  • हाई पिच पर शिशु का रोना

और पढ़ेंः नवजात शिशु का रोना इन 5 तरीकों से करें शांत

बच्चे का ज्यादा रोना या कॉलिक के क्या कारण हैं? (Cause of Colic)

बच्चे का ज्यादा रोना या कॉलिक का सटीक कारण अभी तक पता नहीं चल पाया है। कुछ शिशुओं में देखा गया है कि किसी अंदरूनी समस्या जैसे कब्ज (Constipation), एसिड रिफ्लक्स (Acid reflux), लाइट, शोर आदि के प्रति संवेदनशीलता या ओवर स्टिम्यूलेशन के कारणों की वजह से कॉलिक की समस्या हो जाती है, हालांकि अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है।

शिशु को शांत करने के लिए क्या करें?

बच्चे का ज्यादा रोना या कॉलिक की समस्या 10 से 40 प्रतिशत शिशुओं को प्रभावित करती है। यह समस्या डेढ़ महीने के बच्चे से शुरू होकर छह महीने की उम्र तक भी रह सकती है। बच्चे का ज्यादा रोना (कॉलिक) फिलहाल किसी तरह की दवाओं से कम नहीं किया जा सकता है। पेरेंट्स को इसके लिए इतना परेशान होने की भी जरुरत नहीं होती है क्योंकि यह किसी तरह के दर्द की वजह से नहीं होता है। शिशु को चुप कराने के लिए शिशु को अपनी गोद में उठाएं, उसकी पीठ थपथपाएं या गाना सुनाएं, शिशु से बात करें। ये सब छोटे-छोटे उपाय उसे शांत करने के लिए पर्याप्त होंगे। ये सब करने के बाद भी बच्चे का ज्यादा रोना कम नहीं हो रहा है तो यह चिंता का विषय हो सकता है।

बच्चे का ज्यादा रोना या कॉलिक (Colic) होने पर डॉक्टर से कब संपर्क करना चाहिए?

  • वैसे तो एक शिशु का रोना सामान्य है, लेकिन जब शिशु तीन घंटे से ज्यादा एक हाई पिच पर रोए और उसका कारण भी समझ न आए तो डॉक्टर से सलाह लें।
  • शिशु का अत्यधिक रोना एक दिन में कम न हो, तो ऐसी स्थिति में चिकित्सीय परामर्श जरूरी है।
  • अत्यधिक रोने के साथ शिशु में बुखार (Fever) जैसे अन्य लक्षण भी दिखें तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।

बच्चे का ज्यादा रोना पेरेंट्स को परेशान कर सकता है। हालांकि अक्सर बिना किसी बात के भी नवजात शिशु नियमित रूप से दिन में एक से चार घंटे रोते हैं तो हो सकता है कि पेरेंट्स को उनके चुप न होने पर गुस्सा आए। ऐसी स्थिति में खुद को थोड़ा शांत रखें। अगर फिर भी शिशु शांत न हो डॉक्टर से संपर्क करें।

कई बार बच्चे का ज्यादा रोना किन्हीं विशेष वजहों से ROE के फायदे होता है। वे कई शारीरिक परेशानियाें से जूझ रहे होते हैं। जिनके बारे में कई बार पेरेंट्स को पता नहीं चल पाता। आइए जानते हैं उनके बारे में।

बच्चे का ज्यादा रोना कब्ज (Constipation) की वजह से भी हो सकता है

डॉक्टर्स के मुताबिक, नवजात शिशु दिन में चार या पांच बार या हर ब्रेस्टफीडिंग (Breastfeeding) के बाद स्टूल पास करते हैं। यह सामान्य स्थिति होती है। बच्चे का स्टूल मुलायम से टाइट होना या पास करने में दिक्कत होना कब्ज का ही रूप है। ऐसा होने पर बच्चे असहज हो जाते हैं और रोना शुरू कर देते हैं। ज्यादातर शिशुओं का स्टूल हमेशा वॉटरी या मुलायम आता है। हालांकि, इसकी फ्रीक्वेंसी में विभिन्नता हो सकती है।’

उन्होंने बताया कि यदि छोटे शिशु का चार या पांच दिन में स्टूल मुलायाम आता है तो उसे कब्ज की दिक्कत नहीं होती है। हालांकि मां का दूध पीने पर शिशु की बॉडी अलग तरह से प्रतिक्रिया देती है। वहीं, फॉर्मूला बेस्ड फूड (Formula based feeding) जैसे पाउडर काऊ मिल्क देने पर शिशु दिन में एक बार या अगले दिन स्टूल पास कर सकता है। पाउडर वाले दूध का शिशु की बॉडी में अलग प्रभाव पड़ सकता है, जिससे मां का दूध पीने पर स्टूल पास करने की फ्रीक्वेंसी और पाउडर दूध पीने पर स्टूल की फ्रीक्वेंसी भिन्न हो सकती है।

बच्चों में कब्ज से बचाव के घरेलू उपाय जिससे बच्चे का ज्यादा रोना कम होगा (Home remedies for Constipation)

6 महीने तक बच्चे सिर्फ मां का ही दूध पीते हैं। मां के दूध के अलावा उन्हें कुछ भी खिलाने-पिलाने से डॉक्टर सख्त मना करते हैं। ऐसे में मां जो भी खाएगी उसका असर बच्चे पर ROE के फायदे भी होता है। इसलिए मां को भी अपने आहार पर विशेष ध्यान देना चाहिएः

  • छोटे शिशु सिर्फ मां का दूध पीते हैं, इसलिए जरूरी है कि मां अपनी डायट में हरी सब्जियां, फल और फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों को शामिल करें। का एक निश्चित समय निर्धारित करें।
  • शिशु को कभी भी भूखा न रखें और न ही उसे बहुत ज्यादा दूध पिलाएं। हर दो से तीन घंटे के बीच में बच्चे को थोड़ी-थोड़ी मात्रा में दूध पिलाएं रहें।

बच्चे का ज्यादा रोना गैस की वजह से भी हो सकता है

शिशु के पेट में गैस (Acidity) बनना एक आम समस्या है। इस स्थिति में पेट या आंत में गैस के छोटे-छोटे बबल्स बन जाते हैं। कुछ मामलों में इससे पेट पर दबाव पड़ता है, जिससे दर्द का अहसास होता है। कुछ बच्चों को गैस से परेशानी नहीं होती, लेकिन कुछ मामलों में शिशु जब तक वह गैस पास नहीं कर लेता तब तक वह बेचैन रहता है और रोता रहता है।

हम उम्मीद करते हैं कि बच्चे का ज्यादा रोना जिसे कॉलिक (Colic) कहा जाता है पर आधारित यह आर्टिकल आपको पसंद आया होगा। इस बारे में ज्यादा जानकारी के लिए डॉक्टर से संपर्क करें। हैलो हेल्थ ग्रुप किसी प्रकार की चिकित्सा सलाह, निदान और उपचार प्रदान नहीं करता।

अमेरिका में अब लड़कियां नहीं करा पाएंगी गर्भपात! आया नया Rule, जानें भारत में इसके हैं क्या नियम?

Roe v Wade: 2 मई को अमेरिका में पोलिटिको नाम के जर्नल की रिपोर्ट ने बहुत बड़ा दावा किया है. उन्होंने ऐसा दावा किया जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का ड्राफ्ट है जिसे औपचारिक तौर पर अभी नहीं सुनाया गया है. पोलिटिको के दावे के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट गर्भपात पर 1973 के ऐतिहासिक रो बनाम वेड फैसले को पलटने की तैयारी में है. जजों की बेंच ने बहुमत ने महिलाओं से गर्भपात का अधिकार छीनने में सहमति जताई है. उस लैंडमार्क में कोर्ट ने अनचाहे गर्भ से छुटकारे को महिलाओं का संवैधानिक अधिकार बताया और पोलिटिको की रिपोर्ट के बाद 3 मई को सुप्रीम कोर्ट के बाहर बड़ी संख्या में गर्भपात के अधिकार के समर्थन में प्रदर्शन किया.

क्यों मचा हुआ है अमेरिका में हंगामा?

अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का ड्राफ्ट लीक हुआ है जिसपर प्रेसिडेंट जो बाइडन ने कहा, ‘ये महिलाओं का मौलिक अधिकार है तो वे तय कर सकती हैं कि उन्हें अपने गर्भ का क्या करना है.’ सुप्रीम कोर्ट अगर रो बनाम वेड फैसले को पलटता है तो भी अमेरिका के हर राज्य में गर्भपात एकदम गैरकानूनी नहीं रहेगा. राज्यों को तय करने का अधिकार होगा कि वे गर्भपात पर कानून बनाएं या नहीं. इसका तर्क ये है कि लोग चाहते हैं कि महिलाओं को अधिकार होने चाहिए अपने गर्भ को कैसे उपयोग में लाना है. साथ ही महिलाओं को ये कानून मानने की पूरी छूट होगी और चिंता नहीं करना चाहिए. मगर ये भी सच है कि खबरों के मुताबिक, अलबामा, जॉर्जिया, इंडियाना सहित अमेरिका के 24 राज्य गर्भपात को बैन कर सकता है.

रो बनाम वेड क्या होता है?

रो बनाम वेड क फैसला क्या होता है, ये क्यों जरूरी है इसके बारे में हर किसी को जानकारी होनी चाहिए. ऐतिहासिक फैसला नॉर्मो मैककॉर्वी नाम की एक महिला की खबर आई थी, अदालत कार्यवाही में उन्हें ही जेन रो नाम दिया गया था. असल में हुआ ये था कि साल 1969 में मैककार्वी अबॉर्शन कराना चाहती थीं और उनके दो बच्चे पहले से थे. वह टेक्सस की रहने वाली थीं जहां पर गर्भपात कराना जुर्म है, इसकी इजाजत तभी मिलती है जब प्रेग्नेंसी में मां को खतरा होता है. मैककार्वी ने फेडरल कोर्ट में याचिका फाइल की कि टेक्सस का गर्भपात कानूनी रूप से असंवैधानिक है. यह मुकद्दमा काफी समय चला और बचाव पक्ष के तौर पर तत्कालीन डिसट्रिक्ट अटॉर्नी हेनरी वेड का नाम था. जनवरी, 1973 में सुप्रीम कोर्ट ने मैककॉर्वी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए गर्भ का क्या करना है, गर्भपात कराना चाहिए या नहीं ये तय महिलाओं को करने का अधिकार है. तभी से इस कानून को रो बनाम वेड का नाम दिया गया.

भारत में गर्भपात पर क्या है कानूनी नियम?

साल 1971 में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) में एक एक्ट पास हुआ था जिसके मुताबिक भारत में अलग-अलग परिस्थितियों में महिलाओं को सुरक्षित गर्भापात करने का कानूनी अधिकार है. मगर साल 2021 में इसमें संशोधन किया गया जिसके तहत कुछ खास कैटेगरी की महिलाओं के मेडिकल गर्भापात के लिए गर्भ का समय सीमा 20 सप्ताह से बढाकर 24 सप्ताह कर दिया गया है. संशोधित कानून में रेप पीड़ित, कौटुंबिक व्यभिचार की शिकार या नाबालिग 24 हफ्ते की प्रेग्नेंसी में मेडिकली टर्मिनेट करा सकती हैं. इसके अलावा भ्रुण में प्रेग्नेंसी के दौरान कोई बीमारी पनपती है या महिला की जान को खतरा है तो भी गर्भपात कराया जा सकता है. मगर किसी को भी 24 हफ्ते के ऊपर की प्रेग्नेंसी पर अबॉर्शन कराने का अधिकार नहीं है.

रूल-बेस्ड एक्टिव इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी के क्या हैं फायदे, कैसे करती है ये काम?

अगले महीने रूल-बेस्ड एक्टिव इन्वेस्टमेंट फिलॉसफी आधारित फंड लॉन्च हो रहा है. इसमें निवेश से पहले समझते है ये स्ट्रैटेजी कैसे काम करती है.

  • Vijay Parmar
  • Publish Date - September 27, 2021 / 05:02 PM IST

रूल-बेस्ड एक्टिव इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी के क्या हैं फायदे, कैसे करती है ये काम?

Pixabay - ह्युमन साइकोलॉजी में बायस से छुटकारा नहीं पा सकते, लेकिन पहले से तय नियम आपको इससे बचा सकते हैं.

Rule-Based Active Investment: नियम-आधारित एक्टिव निवेश (rule-based active investment) फिलॉसफी की नींव पर काम करने वाला एक म्यूचुअल फंड अगले महीने लॉन्च होने जा रहा हैं. भारत के सबसे बड़े म्यूचुअल फंड डिस्ट्राब्यूटर द्वारा अपना पहला फंड लॉन्च होगा, जो एक बैलेंस्ड एडवांटेज फंड यानी एक ओपन-एंडेड डायनेमिक एसेट एलोकेशन फंड है. यह फंड एक नियम-आधारित फंड होने की वजह से नियमित अंतराल पर पूर्व निर्धारित फॉर्मूले के मुताबिक एक पोर्टफोलियो को स्वचालित रूप से पुनर्संतुलित करता है. लेकिन, मार्केट के ट्रेंड को पकडने में यह फंड देरी कर सकता है. यदि आप इस फंड में निवेश करना चाहते हैं तो आपको इसके बारे में सब कुछ जान लेना चाहिए. आइए जानते हैं कि रूल-आधारित एक्टिव इन्वेस्टमेंट में किस तरह से काम होता है.

रूल-बेस्ड इन्वेस्टमेंट के प्रकार

रूल-बेज्ड इंवेस्टमेंट को म्यूचुअल फंड मार्केट में फैक्टर-बेस्ड इन्वेस्टिंग या क्वांट इन्वेस्टिंग या स्मार्ट-बीटा या स्मार्ट अल्फा के नाम से भी जाना जाता हैं. ये सारे प्रकार के फंड पैसिव और रूल-बेस्ड होते हैं.

निवेश की रणनीति

रूल-बेस्ड फंड 4 फैक्टर्स के आधार पर नियमों का पालन करते हैं जिसमें वोलेटिलिटी (beta, sharpe ratio, treynor’s ratio), वैल्यू (PE, PS, ROE के फायदे PB, EV-EBITDA), क्वॉलिटी (gearing ratio, Debt-to-FAC, ROCE, ROE) और मोमेंटम (Moving Average, Rate of change of stock price) शामिल हैं.

सरलता और अनुशासन

एक्टिव स्ट्रैटेजी में फंड मैनेजर अनुमान के आधार पर स्टैटेजी बनाता है, लेकिन मार्केट में अनुमान लगाना बहुत कठिन है और शॉर्ट-टर्म के लिए ऐसा करना बहुत ही मुश्किल है. इसके विपरीत, रूल-बेस्ड इन्वेस्टिंग में आपको पहले से तय किए गए नियमों का पालन करना होता है, जिस वजह से सरलता और अनुशासन का फायदा मिलता है.

बैक-टेस्टिंग

रूल-बेस्ड इन्वेस्टिंग में बैक-टेस्टिंग संभव है, यानी फंड मैनेजर तय किए गए नियमों का परीक्षण करके उसमें कुछ बदलाव कर सकता है. यदि फंड मैनेजर को लगता है कि कुछ नियम में बदलाव करने से ज्यादा रिटर्न हासिल हो सकता है तो वह उस तरह से बदलाव लाने के लिए स्वतंत्र है.

पक्षपात से छुटकारा

किसी भी निवेशक के लिए बायस से बचना नामुमकिन है, लेकिन यह काम रूल-आधारित रणनीति से संभव है. आपको कोई एक शेयर अच्छा लग सकता है, लेकिन रूल-बेस्ड स्ट्रैटेजी के तहत वह फिट नहीं होगा तो उसमें निवेश नहीं किया जाएगा, यानी आप बायस से बच सकते हैं. ह्यूमन साइकोलॉजी में बायस आएगा ही, लेकिन निवेश का काम नियमों पर छोड़ दिया जाए तो इससे बचा जा सकता है.

फंड मैनेजर की भूमिका

एक्टिव फंड में, फंड मैनेजर द्वारा खरीद और बिक्री का फैसला लिया जाता है, इसके विपरीत, रूल-बेज्ड फंड में, नियमों के आधार पर इक्विटी और डेट में खरीदने और बेचने की पहचान की जाती है.

पैसिव से अधिक लेकिन एक्विट फंड से कम सक्रिय है रूल-बेस्ड फंड

रूल-बेज्ड फंड का प्रबंधन सॉफ्टवेयर मॉडल द्वारा मात्रात्मक विश्लेषण के आधार पर किया जाता है. खरीदने और बेचने के फैसले पहले से तय नियमों और सॉफ्टवेयर द्वारा पूर्व-निर्धारित अंतराल पर उत्पन्न होते हैं. ये फंड इंडेक्स फंड (पैसिव) की तुलना में अधिक सक्रिय हैं, लेकिन एक्टिव फंड से कम सक्रिय हैं.

जानिये क्या हैं ग्रीन टी पीने के फायदे

जानिये क्या हैं ग्रीन टी पीने के फायदे

सुना तो आपने भी होगा ना हर कसी को ग्रीन टी के बारे में बात करते हुए? भई आजकल यह इतने ट्रेंड में जो है - फिर चाहे वह डायटीशियन हो या पड़ोस में रहने वाली भाभी, सब फिट रहने के लिए यही तो रेकमेंड करतीं हैं! जानिए green tea ke fayde

लेकिन क्या आप जानते हैं इसके फायदे क्या हैं?

1. दिल की बीमारियों से बचाव


दिल की बीमारियाँ ROE के फायदे व स्ट्रोक आजकल मौत के बढ़ते आंकड़ों का मुख्य कारण हैं। ग्रीन टी शरीर में कोलेस्ट्रॉल का लेवल कम करके आपके दिल को स्वस्थ रखती है।

2. शुगर से बचाव


आज दुनिया के करीब 400 मिलियन लोगों को ब्लड शुगर है। एक स्टडी के मुताबिक़, ग्रीन टी पीने वाले लोगों में ब्लड शुगर का खतरा 42% कम हो जाता है।

3. फिट रहने में करती है मदद

4. डेंटल हेल्थ बेहतर होती है


ग्रीन टी मुँह में कैविटी व सड़न पैदा करने वाली बैक्टीरिया को बढ़ने से रोकती है। यही नहीं, यह इन्फ्लुएंजा करने वाले वायरस को भी रोकती है। सामने तो यह भी आया है कि ग्रीन टी साँसों की बदबू से भी छुटकारा दिलाती है।

5. अल्ज़्हेइमेर व पार्किंसंस से बचाव

6. कैंसर से बचाव

कैंसर सेल्स की ज़्यादा बढ़ौतरी की वजह से होता है। ग्रीन टी शरीर में एंटीऑक्सिडेंट्स की मात्रा बढ़ाती है, जिससे इन कैंसरों का खतरा कम हो जाता है

i) ब्रेस्ट कैंसर से बचाव: एक स्टडी के मुताबिक़ जो महिलाएं ग्रीन टी का सेवन करती हैं, उनमें ब्रैस्ट कैंसर के चान्सेस 20-30% तक काम हो जाते हैं।

ii) प्रोस्टेट कैंसर से बचाव: ग्रीन टी मर्दों में होने वाले प्रोस्टेट कैंसर का खतरा 48% तक कम कर देती है।

iii) कोलोरेक्टल कैंसर से बचाव: एक स्टडी ग्रीन टी पीने वाले लोगों में कोलोरेक्टल कैंसर का खतरा 42% तक कम हो ROE के फायदे जाता है।

7. दिमाग को फंक्शन करने में आसानी होती है

ग्रीन टी में कैफीन होता है जिससे दिमाग अच्छे से काम कर पाता है व आप स्मार्ट बनते हैं।

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